जानिये इस बार कब होगा नवदुर्गा मां का आगमन, ये है पुजा विधि

इस बार मलमास पड़ने के कारण नवदुर्गा का त्यौहार इस बार थोड़ा देर से आरंभ हो रहा है 18 सितंबर 2020 से अधिक मास लगा है जो 16 अक्टूबर 2020 तक चलेगा उसके बाद 17 अक्टूबर से नवरात्रि महोत्सव आरंभ होगा.आइये जानते है कि मां के इन पावन दिनों मे क्या है उनकी पूजा अर्चना करने के लाभ.

क्या है नवदुर्गा के हर दिन की तारीख

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मां  शैलपुत्री (नवरात्र पहला दिन) 18 अक्टूबर

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वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रार्धकृतशेखराम।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशंस्विनिम।।

प्रथम दिन मां दुर्गा के शैलपुत्री स्वरूप की पूजा की जाती है. कलश या घट स्थापना के पश्चात मां शैलपुत्री की पूजा विधि विधान से की जाती है. माता शैलपुत्री शांति और उत्साह देने वाली और भय का नाश करने वाली देवी हैं, उनकी आराधना से भक्तों को यश कीर्ति, धन, विद्या और मोक्ष की प्राप्ति होती है.

मां ब्रह्मचारिणी (नवरात्र दूसरा दिन) 19 अक्टूबर

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दधाना करपद्माभ्यामक्षमालाकमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।

नवरात्र के दूसरे दिन मां दुर्गा के ब्रह्मचारिणी स्वरूप की पूजा की जाती है. मां पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में प्राप्त करने के लिए कई हजार वर्षों तक ब्रह्मचारी रखकर घोर तपस्या की थी. इस कठिन तपस्या के कारण उनका नाम  ब्रह्मचारिणी पड़ गया.

मां चंद्रघण्टा (नवरात्र तीसरा दिन) 20 अक्टूबर

 

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पिण्डज प्रवरारूढ़ा चण्डकोपास्त्रकैर्युता।
प्रसादं तनुते महयं चंद्रघण्टेति विश्रुता।।

मां दुर्गा की तीसरी शक्ति का नाम चंद्रघण्टा है. नवरात्र उपासना में तीसरे दिन इन्हीं के विग्रह का पूजन व आराधना की जाती है. इनका स्वरूप परम शांतिदायक और कल्याणकारी है. इनके मस्तक में घण्टे के आकार का अर्धचन्द्र है. इसी कारण इस देवी का नाम चंद्रघण्टा पड़ा.

मां कुष्मांडा(नवरात्र चौथा दिन) 21 अक्टूबर

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सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च।
दधाना हस्तपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तुमे।।

नवरात्रि का चौथा दिन देवी कुष्मांडा की पूजा के लिए समर्पित है. यहां पूरे ब्रह्मांड को एक अलौकिक अंडे के रूप में दर्शाया गया है. और माना जाता है , कि देवी अपनी दिव्य मुस्कान के साथ अंधेरे को समाप्त कर करती हैं. देवी कुष्मांडा के 8 हाथ हैं, और इसी वजह से उन्हें अष्टभुजा देवी के नाम से भी जाना जाता है. शारदीय नवरात्रि चतुर्थी 20 अक्टूबर 2020 को पड़ रही है.

मां स्कंदमाता (नवरात्र पांचवां दिन) 22 अक्टूबर

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सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।

नवरात्रि के पांचवें दिन मां स्कंदमाता की पूजा की जाती है. चार भुजा वाली मां दुर्गा के रूप में गोद में विराजमान होते हैं. इन्हें मूंछ के द्वार खोलने वाली माता भी कहा जाता है. मान्यता है, कि स्कंदमाता की पूजा करने वाले माता के भक्तों की सभी इच्छाएं पूरी होती 22 अक्टूबर मां स्कंदमाता की पूजा होगी.

मां कात्यायनी (नवरात्र छठवां दिन) 23 अक्टूबर

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चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शाईलवरवाहना।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी।।

नवरात्रि के छठी मां कात्यायनी देवी अमरकोश में पार्वती के लिए दूसरा नाम है. गौरी काली हिमावत ईश्वरी इन्हीं के अन्य नाम है. शक्ति बाद में इन्हें शक्ति या दुर्गा जिसमें भद्रकाली और चंडिका भी शामिल हैं. मां कात्यायनी अमोघ फलदाई है. भगवान कृष्ण को पति रूप में पाने के लिए ब्रज की गोपियों ने इन्हीं की पूजा कालिंदी यमुना के तट पर की थी. यह ब्रजमंडल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में प्रतिष्ठित हैं. मां कात्यायनी का स्वरूप अत्यंत चमकीला है. इनकी चार भुजाएं हैं. माता का दाहिनी तरफ का ऊपर वाला हाथ अभय मुद्रा में तथा नीचे वाला वर मुद्रा में है. बाईं तरफ के ऊपर वाले हाथ में तलवार और नीचे वाले हाथ में कमल पुष्प सुशोभित हैं, इनका वाहन सिंह है.

मां कालरात्रि (नवरात्र सातवां दिन) 23 अक्टूबर

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एक वेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता।
लम्बोष्ठी कर्णिकाकणी तैलाभ्यक्तशरीरणी।।
वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टक भूषणा।
वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रिर्भयड्करी।।

नवरात्रि का सातवां दिन देवी भागवत पुराण के अनुसार मां दुर्गा के कालरात्रि स्वरूप की पूजा की जाती है. मां कालरात्रि सदैव अपने भक्तों पर कृपा करती है, और शुभ फल देती है. इसीलिए मां का एक नाम शुभंकरी भी हैं. मां अपने भक्तों के सभी तरह के भय को दूर करती हैं. मां की कृपा पाने के लिए भक्तों को गंगा जल पंचामृत पुष्पगंधा क्षेत्र से मां की पूजा करनी चाहिए इसके अलावा मां को गुड़ का भोग लगाएं.

मां महागौरी (नवरात्र आठवां दिन) 24 अक्टूबर

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श्वेते वृषे समरूढ़ा श्वेताम्बरधरा शुचिः।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा।।

नवरात्रि के आठवें दिन महागौरी शक्ति की पूजा की जाती है. नाम से प्रकट है. इन की इनके सभी आभूषण और वस्त्र सफेद हैं. इसीलिए उन्हें श्वेतांबर धरा कहा गया है. चार भुजाएं हैं, और वाहन वृषभ है. इनके ऊपर वाला दाहिना हाथ अभय मुद्रा है, तथा नीचे वाला त्रिशूल धारण किया हुआ है. ऊपर वाले बाएं हाथ में डमरू धारण कर रखा है, और नीचे वाले हाथ में वर मुद्रा है. इनकी पूरी मुद्रा बहुत शांत है. पति रूप में शिव को प्राप्त करने के लिए महागौरी ने कठोर तपस्या की थी. इसी वजह से इनका शरीर काला पड़ गया, लेकिन तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने इनके शरीर को गंगा के पवित्र जल से धोकर कांतिम बना दिया. उनका रूप गौर वर्ण का हो गया इसीलिए यह महागौरी कहलाए.

मां सिद्धिदात्री (नवरात्र नवां दिन) 25 अक्टूबर

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सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि।
सेव्यामाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।

मां दुर्गा की नौवीं शक्ति को सिद्धिदात्री कहते हैं। जैसा कि नाम से प्रकट है ये सभी प्रकार की सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं। नव दुर्गाओं में मां सिद्धिदात्री अंतिम देवी  हैं।

 

 

 

 

 

 

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