देश के नौजवान युवा कर रहे हैं, देश को बदलने का काम
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देश के ये युवा अपनी मेहनत से बदल रहे हैं देश, हमे भी लेना चाहिए इनसे सीख

हमारे देश भारत को आप नौजवानों का देश भी कह सकते हैं, ऐसे में परिवर्तन की बागडोर भारत के नौजवान युवाओं में ही है. अपने काम के जरिए यह नौजवान युवा कई तरह के बदलाव लाने की क्षमता रखते हैं. आज हम कुछ ऐसे ही नौजवान युवाओं की बात करने जा रहे हैं, जिन्होंने समाज में सोच बदलने से लेकर के समाज में कई तरह के बदलाव लाने के लिए मिसाल कायम कर दी है.

मौसम कुमारी ने की गरीब लड़कियों की मदद

बिहार के नवादा जिले के नक्सल प्रभावित इलाके में 19 साल की मौसम कुमारी कुछ गरीब लड़कियों को सेनेटरी पैड बांट कर उनकी मदद कर रही हैं. मासिक धर्म से जुड़ी परेशानियों को लेकर वह सभी लड़कियों को जागरूक करती हैं. मौसम कुमारी बैग में सेनेटरी पैड लेकर जाती है, और घर-घर हर गरीब लड़की को बांटती है. वह खुद के पैसों से यह पैड खरीदती है और लोगों की मदद करती है. इस नेक काम में मौसम कुमारी के पिता ट्रक ड्राइवर भी उनकी सहायता करते हैं. शुरुआत में तो सभी ने मौसम का काफी विरोध किया, लेकिन वह लोगों की सहायता करने में जुटी रही. अब तक वह 4000 सैनिटरी पैड्स बांट कर कई गरीब लड़कियों की सहायता कर चुकी है.

देश के ये युवा अपनी मेहनत से बदल रहे हैं देश, हमे भी लेना चाहिए इनसे सीख

26 साल की उम्र में सरपंच बन की महिलाओं की मदद

अलवर जिले के थानागाजी क्षेत्र के अजबापुर गांव में रहने वाली प्रियंका नरूका फ़ैशन डिज़ाइन का कोर्स करती थी, किंतु जब उन्होंने देखा कि उनके गाव की सभी महिलाएं दूर-दूर से हैंडपंप और बोरिंग से पानी लाती हैं, तो उन्हें बहुत बुरा लगा और उन्होंने ठान लिया कि वह अपनी पढ़ाई छोड़कर राजनीति में आ जाएंगी.

चुनाव के दौरान प्रियंका ने सभी महिलाओं से निवेदन किया कि वे पुरुषों की बजाय महिलाओं को अपना नेता चुने. प्रियंका की मेहनत रंग लाई और 26 साल की प्रियंका चुनाव जीतने के बाद गांव की सरपंच बन गई. बदलाव लाने के लिए प्रियंका ने पहली प्राथमिकता पानी और बिजली लाने को लेकर की.

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22 साल के लिरोंथंग लोथा ने संवारा कई बच्चों का जीवन

प्रोफ़ेशनल फुटबॉलर 22 साल के लिरोंथंग लोथा कोरोना महामारी के बाद लॉक डाउन होने के समय में अपने गांव वापस आ गए थे. अपने गांव नागालैंड में शराब और ड्रग्स के लत में डूबे हुए बच्चों का भविष्य सुधारने के बारे में उन्होंने कई तरह के उपाय खोजे. लिरोंथंग लोथा पंजाब के एक फुटबाल क्लब में खेलते हैं. उन्होंने बताया कि , ”बच्चों को नशे में देखकर मैंने तय कर लिया कि, जब भी लंबी छुट्टी पर घर वापस आऊंगा, तो इन्हें फुटबॉल खेलना सिखाऊंगा. इनके पैरों को फुटबॉल की आदत लग गई तो नशा अपने आप छूट जाएगा”. 22 साल के लिरोंथंग लोथा ने जून में बच्चों को फुटबॉल खेलना सिखाया, जिसके बाद आज 7:00 से लेकर 17 साल तक के 21 बच्चे उनसे फुटबॉल खेलना सीख रहे हैं.

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लड़की ने नाई का काम कर की लोगों की मदद

सस्मिता बारिक लक्ष्मी नृसिंह जेंट्स पार्लर के बतौर नाई काम कर लोगों की सहायता कर रही हैं. उन्होंने कहा कि, ”कोई भी पैसा किसी महिला या पुरुष तक से मिल नहीं होता है”. सस्मिता तीन बहनों में सबसे छोटी है. उसने 8 साल पहले बहू ग्राम बाजार में कटक केंद्रपाड़ा स्टेट हाईवे के किनारे सैलून शुरू किया था, जिससे कि वह अपने घर में आर्थिक मदद कर सके . सस्मिता सलेपुर ब्लॉक में शेविंग, मूंछ स्टाइल, फेशियल, ब्लीच, स्पा और फेस वॉश की विशेषज्ञ के तौर पर काम करती है. मैट्रिक के बाद वह पैसों की कमी होने के कारण अपने पढ़ाई नहीं कर सकी. इसके बाद उसे कम उम्र में जिम्मेदारी संभाल नहीं पड़ी.

सस्मिता ने बताया , ” मेरी मां की मृत्यु 10 साल पहले हो गई थी, जिसके बाद मेरे दादा बैदर काफी निधन हो गया. मुझे पढ़ाई छोड़ कर परिवार की सहायता के लिए यह कदम उठाना पड़ा और मैंने काम शुरू कर दिया”.

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24 साल के हिमांशु ने बनाया बच्चों के लिए इनोवेटिव बैग

हेन्नुर के इंटरनेशलन कॉलेज आफ डिजाइन के प्रोडक्ट डिजाइन के छात्र हिमांशु मौनेश्वर देवरे ने एक खास स्कूल बैग बनाया है, इस बैग क्या खासियत है कि यह बैग होने के साथ-साथ एक डेस्क भी बन सकता है. नागपुर के रहने वाले 24 साल के हिमांशु एनजीओ के साथ डिजाइनर प्रोडक्ट पर काम करते हैं. हिमांशु ने बताया कि, ” मैंने शहर में एक प्रदर्शनी में यह आर्ट वर्क देखा था, जिसके बाद मैंने बच्चों की मदद करने का प्रण लिया. मैं उन बच्चों की मदद करना चाहता था जो डेस्क की कमी के कारण नीचे बैठकर पढ़ते हैं. 19 जनवरी से मार्च तक कारीगरों के साथ काम करके तकनीकी सीखी और बैंक के लिए डिजाइन विकसित की”. बच्चों के कंधों और पीठ के साथ-साथ तकनीकी डिटेल्स को भी ध्यान रखते हुए यह बैग बनाया गया है, जिसमें 3 किलो तक का भार भी रखा जा सकता है.

 

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युवाओं ने तैयार कर दिया टूटा हुआ पूल

कुछ युवाओं ने मिलकर केरल के इडुक्की के 2 साल पुराने टूटे हुए पुल को पुनर्निर्माण किया. दरअसल यह पूल पिछले 2 सालों से पूरी तरह से ध्वस्त हो चुका था, और चारों ओर से पुल पर मलबा ही मलबा नजर आ रहा था. इन युवाओं ने मिलकर 5 घंटे के अंदर पुल को फिर से बना डाला. पुल को बनाने वाले युवा चैरिटी ऑर्गनाइजेशन के है. देश के युवाओं द्वारा इस तरह के सराहनीय कार्यों को देख कर इस बात पर यकीन किया जा सकता है कि, देश के युवा देश को बदलने में पूरी ताकत रखते हैं.

 

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प्रोफेसर कर रहे हैं भिखारियों की मदद

प्रोफ़ेसर पी. नवीन कुमार तमिलनाडु के रहने वाले हैं, जो कि पिछले 6 साल से जेकेकेएन कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग एंड टेक्नोलॉजी में पढ़ाते हैं. वह सड़क पर रहने वाले गरीब भिखारियों और बेसहारा लोगों के लिए पुनर्वास करते हैं. उन्होंने बताया कि, ” मैंने तब यह काम शुरू किया था, जब मैं इंजीनियरिंग कर रहा था. मेरे पास रात के खाने तक के पैसे सिर्फ ₹10 ही होते थे, मैंने खाना खाने के लिए सड़क किनारे इंस्टॉल देखा. उसी समय मेरी मुलाकात भिखारियों से भी हो जाया करती थी, कभी-कभी भिखारी पैसे के लिए मेरे पास आते और हम उन्हें खाना खरीद कर देते थे और खुद भूखे सो जाते थे”. प्रोफेसर ने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर आचार्यम की स्थापना की और अपने वेतन, छोटे दान और ट्रस्ट के माध्यम से 18 जिलों में 400 स्वयं सेवकों की एक टीम के साथ 572 भिखारियों को पुनर्स्थापित किया.

 

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मेरा नाम उर्वशी श्रीवास्तव है. मैं हिंद नाउ वेबसाइट पर कंटेंट राइटर के तौर पर कार्य करती हूं. वैसे तो मुझे ऑनलाइन वेब पर हर बिट्स की खबर पर काम करना पसंद है, लेकिन मेरा रुझान मनोरंजन और करंट अफेयर की खबरों पर ज्यादा रहता है. इसके अलावा मुझे देश-विदेश से जुड़ी हर खबरों पर नजर रखना और जानकारी लेना पसंद है.