Aarti Kunj Bihari Ki: जब श्री कृष्ण का नाम जुबान पर आता है तो सबसे पहली आरती कुंज बिहारी (Aarti Kunj Bihari pdf) ही याद आती है। जन्माष्टमी के दिन भगवान श्रीकृष्ण को खुश करने के लिए इस आरती का गायन किया जाता है। आइए आरती कुंज बिहारी की गाते हैं…..
आरती : कुंज बिहारी की
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधारी की।
गले में बैजयंती माला, बजावै मुरली मनोहरा॥
अर्थ:
हे श्रीकृष्ण! आपकी आरती हो, आप ही कुंज बिहारी (वनों में रमण करने वाले) और गिरिराज धारण करने वाले हो। आपके गले में सुंदर बैजयंती माला है और आप मधुर मुरली बजा रहे हैं।
शिव सकल मुनि जन उचारें, नारद शारद शीश झुकाएँ।
आवति राधिका संग झूमत, मुरली मधुर बजाएँ॥
अर्थ:
आपकी महिमा का बखान शिवजी, नारद और सरस्वती माता भी करते हैं। राधा जी संग आप झूमते हुए मधुर बांसुरी बजाते हैं।
कन्हैया ललित त्रिभंग सुरत मनोहर, अतिशय छवि निज की।
संग सुरत सुन्दरि राधिका, चंचल चितवन चोरत॥
अर्थ:
त्रिभंग मुद्रा में खड़े श्रीकृष्ण का रूप अत्यंत मनोहर है। राधारानी संग उनकी छवि देखते ही मन को चुरा लेती है।
अरुण अधर मधुर मुरली बजावै, सुनि मन हरषाए।
गोपि गोकुल रसिक वरतावे, हर्षित मन भावै॥
अर्थ:
श्रीकृष्ण अपने लाल अधरों से मधुर बांसुरी बजाते हैं। जिसे सुनकर सभी गोपियां आनंदित हो उठती हैं और गोकुल रस में डूब जाती हैं।
चमकते पीताम्बर शोभा, छवि अमित।
कटि किंकिणि बजत नखरु मणि कुंडल, गल माला तन अमित॥
अर्थ:
पीले वस्त्र धारण किए श्रीकृष्ण की शोभा निराली है। उनकी कमर में करघनी (किंकिणि), कानों में कुंडल और गले में हार उन्हें और भी सुंदर बनाते हैं।
श्रीवत्सकौस्तुभ रतन शोभित, भाल तिलक ललित।
कर सुदर्शन शंख चक्र गदा, धर्मरक्षक नंदलाल॥
अर्थ:
श्रीकृष्ण के वक्ष पर श्रीवत्स और कौस्तुभ मणि शोभायमान है। मस्तक पर तिलक सुशोभित है। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म हैं जो धर्म की रक्षा करने के प्रतीक हैं।
सारांश
-
यह आरती श्रीकृष्ण जी की सुंदर छवि, बांसुरी की मधुर ध्वनि और राधा संग उनके दिव्य स्वरूप का वर्णन करती है।
-
इसमें बताया गया है कि देवता, ऋषि-मुनि, और माता राधा तक उनकी स्तुति करते हैं।
- श्रीकृष्ण के दर्शन और भजन से मन को शांति, आनंद और भक्ति की प्राप्ति होती है।
कुंज बिहारी कौन हैं?
-
कुंज बिहारी भगवान श्रीकृष्ण का दूसरा नाम है।
-
“कुंज” का अर्थ है – वन, बाग, उपवन।
-
“बिहारी” का अर्थ है – विहार करने वाले, खेलने वाले।
- यानी “कुंज बिहारी” का मतलब हुआ – वे श्रीकृष्ण जो वृंदावन के कुंज-वनों में राधा और गोपियों के साथ विहार करते हैं।
कहां प्रकट हुए कुंज बिहारी?
स्वामी हरिदास जी की गहन भक्ति से प्रसन्न होकर श्री बांके बिहारी जी मार्गशीर्ष शुक्ल पंचमी के दिन वृंदावन के निधिवन में प्रकट हुए थे। स्वामी हरिदास जी ने ही राधा-कृष्ण के इस दिव्य स्वरूप को ‘बांके बिहारी’ नाम प्रदान किया।
कहां है कुंज बिहारी का मंदिर?
राजस्थान के जोधपुर शहर में घंटाघर के पास कुंज बिहारी मंदिर स्थित है। वहीं उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के वृंदावन शहर में भी बांके बिहारी का एक प्रसिद्ध मंदिर है, जिसे कुंज बिहारी (Aarti Kunj Bihari ki video) नाम से भी जाना जाता है।
कुंज बिहारी को भोग में क्या पसंद?
कुंज बिहारी को माखन-मिश्री समेत केसरिया अधोटा और अमरूद का भोग लगाया जाता है. माखन और मिश्री का भोग उन्हें प्रतिदिन लगाया जाता है. जबिक केसरिया अधोटा उन्हें बेहद प्रिय था. अमरूद के चढ़ावे से कुंज बिहारी प्रसन्न होते हैं.
ये भी पढ़ें: श्रीकृष्ण ने पहले ही कर दी थी कलयुग में होने वाली इन 5 बातों की भविष्यवाणी, अब हो रही है सत्य साबित
राधा के मृत्यु के बाद भगवान श्रीकृष्ण ने खाई थी ये कसम, हमेशा के लिए छोड़ दिया था ये काम
श्रीकृष्ण की 123वीं पीढ़ी के वंशज आज बन चुके हैं मंत्री, हिमाचल की राजनीति पर है राज
कृष्ण की भक्ति में लीन रहती है सलमान खान की एक्ट्रेस, दूसरी मीरा बनने के लिए त्याग दी इंडस्ट्री
