प्रेरणा: बचपन में चली गई आँखों की रौशनी, लोग मारते थे ताना पत्नी की मदद से खड़ा किया करोड़ो का बिजनेस, आज 200 नेत्रहीन लोगों को दी है नौकरी

अक्सर ऐसा माना जाता है कि भारत में लोगों के पास हुनर की कोई कमी नहीं होती बेशक व्यक्ति विकलांगता से ही क्यो न प्रभावित हो लेकिन उसमें एक न एक अनोखा हुनर होता ही है. ऐसा ही एक हुनर भावेश भाटिया नामक व्यकित के पास हो जो अपनी नेत्रहीनता के बावजूद आज भारत में करोड़ो की कंपनी खड़ी करके बैठे हुए हैं सिर्फ और सिर्फ उनकी दिन रात की मेहनत की बदोलत.

भावेश भाटिया ने 23 साल की उम्र में अपनी आंखों की रौशनी खो दी थी. और बचपन में उन्हें हल्का बहुत दिखाई देता था. Retina Muscular Deterioration के चलते उनकी पूरी रौशनी चली गयी. उस समय वो बतौर होटल मैनेजर काम करते थे और अपने गरीब परिवार की रोटी का एकमात्र सहारा थे, लेकिन नेत्रहीनता बाद उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया, जिसके बाद उन पर पैसों की और किल्लत हो गई लेकिन उन्होनें हार नही मानी.

नेत्रहीनता की वजह से लोन मिलना मुश्किल

प्रेरणा: बचपन में चली गई आँखों की रौशनी, लोग मारते थे ताना पत्नी की मदद से खड़ा किया करोड़ो का बिजनेस, आज 200 नेत्रहीन लोगों को दी है नौकरी

भावेश बताते हैं कि

“लोग यह स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं थे कि वह नेत्रहीनता के साथ अपने पैरों पर खड़े कैसे हो सकते हैं. जब भी वो मदद मांगने जाते थे हर बार कहा जाता था अरे तुम अंधे हो आप क्या अच्छा कर सकते हैं? इसीलिए उन्होनें पेशेवर मोमबत्ती निर्माताओं और अन्य संस्थानों से मार्गदर्शन प्राप्त करने की कोशिश की, लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की वो लोन लेकर अपने काम को और आगे बढ़ाना चाहते थे. मगर उनके प्रति ख़राब रवैये से उन्हें अपमान सहना पड़ रहा था. उन्होंने हार नहीं मानी. वो अपनी पत्नी के साथ मॉल जाते थे. उन्होंने मोमबत्ती को छूकर एहसास कर अपने घर में डिजाईन बनाना शुरू कर दिया.”

आज कंपनी में 200 ब्लाइंड कर्मचारी काम करते हैं

प्रेरणा: बचपन में चली गई आँखों की रौशनी, लोग मारते थे ताना पत्नी की मदद से खड़ा किया करोड़ो का बिजनेस, आज 200 नेत्रहीन लोगों को दी है नौकरी

भावेश को Empowerment for Persons with Disabilities के लिए नेशनल अवार्ड से भी सम्मानित किया जा चुका है. आज सनराइज कैंडल्स 9,000 डिजाइन वाली मोमबत्तियां बनाती है. कंपनी हर दिन 25 टन मोम का उपयोग करती है. भावेश अपना मोम ब्रिटेन से खरीदते हैं. उनके ग्राहकों में रिलायंस इंडस्ट्रीज, रैनबैक्सी, बिग बाजार, नरोदा इंडस्ट्रीज और रोटरी क्लब आदि कुछ प्रमुख नाम हैं.

नीता सारे एडमिनिस्ट्रेटिव काम संभालती हैं. उनकी कम्पनी में करीब 200 कर्मचारी हैं, भावेश का टैलेंट यही तक सीमित नहीं है. वो स्पोर्ट्स में बहुत अच्छे हैं. उनके पास पैरालंपिक स्पोर्ट्स में कुल 109 मेडल मिले हैं. भावेश की पत्नी नीता भी किसी बड़ी मिसाल से कम नहीं हैं. उन्होंने भावेश का हाथ थामकर उनकी हर संभव मदद की और आज पॉजिटिव रिजल्ट सबके सामने हैं.

ठेले पर काम करते हुए प्यार मिला

प्रेरणा: बचपन में चली गई आँखों की रौशनी, लोग मारते थे ताना पत्नी की मदद से खड़ा किया करोड़ो का बिजनेस, आज 200 नेत्रहीन लोगों को दी है नौकरी

 

बेशक भावेश नेत्रहीनता थे, लेकिन इसके बावजूद वो खुश थे, क्योंकि वो अपने मन का काम कर रहे थे और किस्मत ने भी उनके सहारे और प्यार के रूप में दस्तक दी. जहां से उनकी लव स्टोरी की शुरूआत भी हो गई. दरअसल, भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार एक बार एक महिला उनके ठेले पर मोमबत्ती खरीदने आई. भावेश को उस महिला का सौम्य व्यवहार और हंसने का तरीका बहुत पसंद आया. उनकी कुछ घंटों की बात के बाद दोनों में दोस्ती हो गयी. उस महिला का नाम था नीता.

नीता और भावेश को एक-दूसरे से प्यार हो गया और दोनों ने शादी का फैसला किया. मगर नीता का परिवार एक गरीब और नेत्रहीनता की वजह से भावेश के साथ शादी करवाने को मंजूर नहीं था. मगर नीता के मज़बूत इरादों के आगे परिवार झुक गया और दोनों ने शादी कर ली और उन्होंने हमेशा अपने पति की मदद की. जल्द ही, दोनों ने एक दो पहिया वाहन खरीद लिया, जिससे नीता भावेश की बनाई हुई मोमबत्ती शहर में बेचने ले जाती थीं. उनका काम अच्छा चलने लगा और नीता ने वैन चलाना भी सीख लिया और अब वो ज्यादा मात्रा में मोमबत्तियां ले जाने लगे.

तुम कुछ ऐसा करो कि दुनिया तुम्हें देखे

प्रेरणा: बचपन में चली गई आँखों की रौशनी, लोग मारते थे ताना पत्नी की मदद से खड़ा किया करोड़ो का बिजनेस, आज 200 नेत्रहीन लोगों को दी है नौकरी

भावेश खूद बताते हैं कि एक बार उनकी मां ने उनसे कहा था कि

“क्या हुआ तुम अब दुनिया नहीं देख सकते हो? तुम कुछ ऐसा करो कि दुनिया तुम्हें देखे.”

इसके बाद भावेश उठे और खुद से नफ़रत करने के बजाय एक बार खुद को स्थापित करने के लिए एक नए सफ़र पर निकल पड़े. इसके अलावा भावेश बताते हैं कि उन्हें

“बचपन से ही अपने हाथों से चीजें बनाने में दिलचस्पी थी. इसमे वो पतंगें बनाते थे, मिट्टी के साथ प्रयोग करके खिलौने और मूर्तियां आदि बनाता थे, यहां तक की उन्होनें मोमबत्ती बनाने का काम करने का निश्चय किया क्योंकि वो आकृति और गंध समझ सकते थे.”