आखिर क्या हैं देश में फोन टेपिंग के सही नियम, क्या कहती है कानून की किताब

आखिर क्या हैं फोन टेपिंग के सही नियम, क्या कहती है कानून की किताब

इस वक्त देश में और खासकर राजस्थान में फोन टेपिंग को लेकर एक नया विवाद शुरू हो गया है जिसके तहत राज्य के कल विधायकों के फोन टेप किए गए हैं।

दिल्ली: राजस्थान में सियासत का मुख्य मुद्दा फोन टैपिंग हो गया जहां नेता फोन‌ टैपिंग को अवैधानिक बताकर राजस्थान सरकार पर आरोप-प्रत्यारोप कर रहे हैं। इस बीच केंद्रीय गृहमंत्रालय ने भी राजस्थान के मुख्य सचिव से फोन टेपिंग को लेकर जवाब मांगा है। इसी बीच ये बहस‌भी गर्म हो गई है कि भारत में फोन टैपिंग के नियम क्या हैं और लोगों के क्या अधिकार है इसको लेकर चलिए आज आपको कुछ जानकारी देते हैं।

किस नियम के तहत अधिकार

जानकारी के मुताबिक केंद्र सरकार और सभी राज्य की सरकारों को कहीं भी फोन टेपिंग का अधिकार भारतीय टेलीग्राफिक अधिनियम 1885 के कानून के अनुच्छेद 5(2) के तहत मिला हुआप है। नियमों के मुताबिक राजनेताओं के फोन की टेपिंग का किसी को कोई अधिकार नहीं है। जबकि सुरक्षा के मामले में सभी तरह की न्यायिक प्रक्रियाओं के आधार पर फोन टेप किए जाते हैं।

फोन टेपिंग ‌कराने की अनुमति देने के मुख्य अधिकार केंद्र में गृह मंत्रालय और ठीक उसी तरह राज्य में गृह मंत्रालय या प्रमुख गृह सचिव के पास होते हैं। इनकी अनुमति के बिना किसी के भी फोन की टेपिंग नहीं की जा सकती है। यही कारण है कि राजस्थान के इस मामले में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राजस्थान के मुख्य गृह सचिव को तलब किया है।

बेहद कठिन है नियम

फोन टेपिंग को जितना आसान समझा जाता है वो उतना है नहीं…! असल में ये मुद्दा बेहद पेचीदा होता है जिसके अंतर्गत किसी भी शख्स का फोन टेप करने से पहले इसकी इजाजत गृहमंत्रालय से लेनी पड़ती है जिसके बिना ये करना गैरकानूनी माना जाता है।

नोएडा के सर्विलांस मामले के डीएसपी विनोद सिंह सिरोही ने बताया है कि यदि सुरक्षा कारणों से ऐसी स्थिति बने तो उसके लिए सात दिनों की इजाजत मिलती है। जिसके लिए आईजी रेंज के स्तर के अधिकारी से अनुमति लेनी पड़ती। यहीं नहीं फोन टेपिंग बहुत विशिष्ट परिस्थितियों में किया जाता है। अधिकतर फोन ट्रेसिंग के जरिए ही पुलिस अपने काम करती है।

अभिव्यक्ति की आजादी का हनन

फोन टेपिंग के आरोपों के साथ ही देश में आए दिन राजनीतिक एजेंडे चलते रहते हैं। राजनीतिक पार्टियां एक दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप का खेल खेलती हैं और इसके जरिए जनता को गुमराह करने की कोशिश करती हैं। दूसरी और सुप्रीम कोर्ट ने भी फोन टेपिंग को अभिव्यक्ति की आजादी और निजता का हनन माना है। जिसके बाद केंद्र सरकार ने 1951 के संशोधन में 491 (A) का भी एक नियम लागू किया। लेकिन वह सतही तौर पर किसी काम का नहीं रहा और फोन टेपिंग का ही खेल आज भी उसी तरह चल रहा है।

 

 

 

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