श्राद्ध में पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए जरूर करें ये उपाय
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Pitru Paksha 2020: श्राद्ध में पितरों का आशीर्वाद पाने के लिए जरूर करें ये उपाय, दूर होगी जीवन की हर बाधा

पितृ पक्ष दो सितंबर से शुरू हो चुके हैं और 17 सितंबर को समाप्त होंगे। इस दौरान पितरों के विधि-विधान से श्राद्ध कर्म किए जाते हैं।

नई दिल्ली- पितृ पक्ष दो सितंबर से शुरू हो चुके हैं और 17 सितंबर को समाप्त होंगे। इस दौरान पितरों के विधि-विधान से श्राद्ध कर्म किए जाते हैं। साथ ही पितरों के तर्पण के लिए दान-पुण्य के कार्य किए जाते हैं। ऐसा करने से पितरों का आशीर्वाद मिलता है। बलभद्र पीठाधीश्वर आचार्य विष्णु जी महाराज के अनुसार जानिए पितृ पक्ष में कौन से विशेष उपाय करने चाहिए…

पितृ श्राद्ध

पूर्णिमा श्राद्ध – 2-9-20, बुधवार
1 प्रतिपदा श्राद्ध – 3-9-20 गुरुवार
2 द्वितीया श्राद्ध – 4-9-20 शुक्रवार
3 तृतीया श्राद्ध- 5-9-20 शनिवार
4 चतुर्थी श्राद्ध-6-9-20 रविवार
5 पंचमी श्राद्ध- 7-9-20 सोमवार
6 षष्ठी श्राद्ध-8-9-20 मंगलवार
7 सप्तमी श्राद्ध- 9-9-20 बुधवार
8 अष्टमी श्राद्ध- 10-9-20 गुरुवार
9 नवमी श्राद्ध- 11-9-20 शुक्रवार
10 दशमी श्राद्ध- 12-9-20 शनिवार
11 एकादशी श्राद्ध- 13-9-20 रविवार
12 द्वादशी श्राद्ध- 14-9-20 सोमवार
13 त्रयोदशी श्राद्ध- 15-9-20 मंगलवार
14 चतुर्दशी श्राद्ध- 16-9-20 बुधवार
15 सर्वपितृ अमावस श्राद्ध 17-9-20 गुरुवार

पितृ दोष क्या होता है ?

हमारे ही पूर्वज सूक्ष्म व्यापक शरीर से अपने परिवार को जब देखते हैं, और महसूस करते हैं कि हमारे परिवार के लोग ना तो हमारे प्रति श्रद्धा रखते हैं और न ही इन्हें कोई प्यार या स्नेह है और ना ही किसी भी अवसर पर ये हमको याद करते हैं, ना ही अपने ऋण चुकाने का प्रयास ही करते हैं तो ये आत्माएं दुखी होकर अपने वंशजों को श्राप दे देती हैं। जिसे पितृ दोष कहा जाता है।

पितृ दोष एक अदृश्य बाधा है। ये पितरों द्वारा रुष्ट होने के कारण होती है। पितरों के रुष्ट होने के बहुत से कारण हो सकते हैं जैसे- आपके आचरण से, किसी परिजन द्वारा की गयी गलती से, श्राद्ध आदि कर्म ना करने से, अंत्येष्टि कर्म आदि में हुई किसी त्रुटि के कारण भी हो सकता है।

इसके अलावा मानसिक अवसाद, व्यापार में नुक्सान, परिश्रम के अनुसार फल न मिलना, विवाह या वैवाहिक जीवन में समस्याएं, करिअर में समस्याएं या संक्षिप्त में कहें तो जीवन के हर क्षेत्र में व्यक्ति और उसके परिवार को बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

पितृ दोष होने पर अनुकूल ग्रहों की स्थिति, गोचर, दशाएं होने पर भी शुभ फल नहीं मिल पाते। कितना भी पूजा पाठ, देवी-देवताओं की अर्चना की जाए उसका शुभ फल नहीं मिल पाता।

पितृ दोष दो प्रकार से प्रभावित करता है

1- अधोगति वाले पितरों के कारण
2- उर्ध्वगति वाले पितरों के कारण

अधोगति वाले पितरों के दोषों का मुख्य कारण परिजनों द्वारा किया गया गलत आचरण, अतृप्त इच्छाएं, जायदाद के प्रति मोह और उसका गलत लोगों द्वारा उपभोग होने पर, विवाहादि में परिजनों द्वारा गलत निर्णय, परिवार के किसी प्रियजन को अकारण कष्ट देने पर पितर क्रुद्ध हो जाते हैं, परिवार जनों को श्राप दे देते हैं और अपनी शक्ति से नकारात्मक फल प्रदान करते हैं।

उर्ध्वगति वाले पितर सामान्यतः पितृदोष उत्पन्न नहीं करते, परन्तु उनका किसी भी रूप में अपमान होने पर अथवा परिवार के पारंपरिक रीति-रिवाजों का निर्वहन नहीं करने पर वह पितृदोष उत्पन्न करते हैं। इनके द्वारा उत्पन्न पितृदोष से व्यक्ति की भौतिक एवं आध्यात्मिक उन्नति बिलकुल बाधित हो जाती है। फिर चाहे कितने भी प्रयास क्यों ना किये जाएं, कितने भी पूजा पाठ क्यों ना किये जाएं उनका कोई भी कार्य ये पितृदोष सफल नहीं होने देता। पितृ दोष निवारण के लिए सबसे पहले ये जानना जरूरी होता है कि किस गृह के कारण और किस प्रकार का पितृ दोष उत्पन्न हो रहा है ?

जन्म पत्रिका और पितृ दोष जन्म पत्रिका में लग्न,पंचम, अष्टम और द्वादश भाव से पितृदोष का विचार किया जाता है। पितृ दोष में ग्रहों में मुख्य रूप से सूर्य, चन्द्रमा, गुरु, शनि और राहू -केतु की स्थितियों से पितृ दोष का विचार किया जाता है।

इनमें से भी गुरु, शनि और राहु की भूमिका प्रत्येक पितृ दोष में महत्वपूर्ण होती है इनमें सूर्य से पिता या पितामह, चन्द्रमा से माता या मातामह, मंगल से भ्राता या भगिनी और शुक्र से पत्नी का विचार किया जाता है।

अधिकांश लोगों की जन्म पत्रिका में मुख्य रूप से क्योंकि गुरु, शनि और राहु से पीड़ित होने पर ही पितृ दोष उत्पन्न होता है, इसलिए विभिन्न उपायों को करने के साथ साथ व्यक्ति यदि पंचमुखी, सातमुखी और आठ मुखी रुद्राक्ष भी धारण कर ले, तो पितृ दोष का निवारण शीघ्र हो जाता है। पितृ दोष निवारण के लिए इन रुद्राक्षों को धारण करने के अतिरिक्त इन ग्रहों के अन्य उपाय जैसे मंत्र जप और स्तोत्रों का पाठ करना भी श्रेष्ठ होता है।

पितरों के रूष्ट होने के लक्षण

पितरों के रुष्ट होने के कुछ असामान्‍य लक्षण अकालमृत्यु होना, गृह में गर्भपात होना, जीवन कष्ट में बीतना आदि हैं।

पितृ दोष शांति के उपाय

– सामान्य उपायों में षोडश पिंड दान, सर्प पूजा, ब्राह्मण को गौ दान, कन्या दान, कुआं, बावड़ी, तालाब आदि बनवाना, मंदिर प्रांगण में पीपल, बड़ (बरगद) आदि देव वृक्ष लगवाना एवं विष्णु मन्त्रों का जाप आदि करना, प्रेत श्राप को दूर करने के लिए श्रीमद्द्भागवत का पाठ करना चाहिए।

– वेदों और पुराणों में पितरों की संतुष्टि के लिए मंत्र, स्तोत्र एवं सूक्तों का वर्णन है जिसके नित्य पठन से किसी भी प्रकार की पितृ बाधा क्यों ना हो, शांत हो जाती है अगर नित्य पठन संभव ना हो, तो कम से कम प्रत्येक माह की अमावस्या और आश्विन कृष्ण पक्ष अमावस्या अर्थात पितृपक्ष में अवश्य करना चाहिए। वैसे तो कुंडली में किस प्रकार का पितृ दोष है उस पितृ दोष के प्रकार के हिसाब से पितृ दोष शांति करवाना अच्छा होता है।

भगवान भोलेनाथ की तस्वीर या प्रतिमा के समक्ष बैठ कर या घर में ही भगवान भोलेनाथ का ध्यान कर ”ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महादेवाय च धीमहि तन्नो रुद्रः प्रचोदयात” मंत्र की एक माला नित्य जाप करने से समस्त प्रकार के पितृ- दोष संकट बाधा आदि शांत होकर शुभत्व की प्राप्ति होती है। मंत्र जाप प्रातः या सायंकाल कभी भी कर सकते हैं।

– अमावस्या को पितरों के निमित्त पवित्रता पूर्वक बनाया गया भोजन तथा चावल बूरा, घी एवं एक रोटी गाय को खिलाने से पितृ दोष शांत होता है।

– अपने माता -पिता, बुजुर्गों का सम्मान, सभी स्त्री कुल का आदर/सम्मान करने और उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति करते रहने से पितर हमेशा प्रसन्न रहते हैं।

– प्रतिदिन दुर्गा सप्तशती या सुन्दर काण्ड का पाठ करने से भी इस दोष में कमी आती है।

– अमावस्या वाले दिन अवश्य अपने पूर्वजों के नाम दुग्ध, चीनी, सफ़ेद कपडा, दक्षिणा आदि किसी मंदिर में अथवा किसी योग्य ब्राह्मण को दान करना चाहिए।

 

 

 

 

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