ये हैं वो 2 शख्स जिन्होंने राम मंदिर निर्माण के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया
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ये हैं वो 2 शख्स जिन्होंने राम मंदिर निर्माण के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया

– अंग्रेजी हुकूमत से आजादी मिलते ही रामचंद्र परमहंस ने फूंक दिया गया था राम मंदिर के लिए बिगुल
– सिंघल के एक आवाह्न पर जान पर खेलकर अयोध्या पहुंचे थे लाखों कारसेवक
– कल्याण सिंह ने अपने रहते राम भक्तों पर नहीं चलने दी थी गोलियां, फिर छोड़ दी थी मुख्यमंत्री की कुर्सी

“मेरे लहु का भले ही एक-एक कतरा गिर जाये, मगर मेरे रामलला का मंदिर बन जाये….”   इसी जज्बे के साथ न जाने कितने ही राम भक्तों ने हंसते-हंसते 1992 में अपनी जान न्योछावर कर दी थी। जिस मकसद से देश भर के राम भक्तों ने अयोध्या के लिए कूच किया था,  उस मकसद को पूरा करने में अपने शरीर का एक-एक कतरा बहा दिया था और अंतिम सांस तक विवादित ढांचे को गिरा कर जय श्रीराम  के उद्घोष से देश के कोने-कोने को गुंजायमान कर दिया था.

राम मंदिर निर्माण के कई अगुवा तो अब इस दुनिया से अंतिम विदा ले चुके हैं, लेकिन उनकी ही जलाई चिंगारी का नतीजा है कि आज सदियों के बाद राम मंदिर  निर्माण की नींव 5 अगस्त 2020 को रखी जा रही है. ऐसे सुखद पल में अगर उनको याद न किया जाये ऐसा कैसे हो सकता है. तो आइए जाने उनके बारे में जिन्होंने अपना सर्वस्व श्री राम के चरणों में न्योछावर करते समय जरा भी उफ नहीं की….

इस राम भक्त ने तो न्योछावर कर दी थी मुख्यमंत्री की कुर्सी…..

तमाम राम भक्तों के शीर्षस्थ नेताओं व मंत्रियों में पूर्व मुख्यमंत्री कल्याण सिंह के बलिदान को  भुलाया नहीं जा सकता। राम मंदिर के लिए उन्होंने अपने पद तक का त्याग कर दिया था। अब जब राम मंदिर बनने जा रहा है तब उनकी आयु 88 वर्ष हो चली है। बहुत सी यादें तो अब उनके जेहन में नहीं आती हैं। पर राम मंदिर का जिक्र छेड़ देने पर वह राम मंदिर से जुड़ी एक-एक घटना बयां कर जाते हैं। वह कहते हैं कि मेरे दिल की आकांक्षा थी कि भव्य राम मंदिर का निर्माण हो जाए यह मेरे लिए अत्यंत ही सुखद पल है कि मेरी अंतिम इच्छा पूरी होने जा रही है। बस राम से मेरी यही विनती है। मेरे ही जीवन काल में राम मंदिर बनकर तैयार हो जाए और मैं शांति से मृत्यु की आगोश में जा सकूं।

सरकार चली गई तो क्या, मेरे माथे पर नहीं एक भी राम भक्त की हत्या का कलंक

उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और राजस्थान के राज्यपाल कल्याण सिंह कहते हैं कि 1992 में राम के लिए मेरी सरकार चली गई तो क्या मेरे माथे पर एक भी राम भक्त की हत्या का कलंक नहीं। उन्होंने कहा कि ढांचा विध्वंस इस आंदोलन की सबसे बड़ी घटना है।

छह दिसंबर के दिन जब लाखों की संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंचे  तो तत्कालीन जिलाधिकारी ने मुझे संदेश दिया कि कारसेवकों की वजह से अर्धसैनिक बल की टुकड़ियां आगे नहीं पहुंच पा रही हैं। प्रशासन ने मुझसे गोली चलाने की अनुमति मांगी। मैंने मना कर दिया और कहा कि गोली चली तो बड़ा नरसंहार होगा। मैंने यह लिखित आदेश में कहा था कि गोली चली तो बड़ा खून खराबा हो सकता सकता है। जिससे प्रदेश और देश हिंसा की लपटों से घिर जाएगा। कारसेवकों को रोकने के लिए जो संभव हो सके वह उपाय करें पर गोली न चलाएं। यह मैंने कहा। मुझे उस फैसले पर गर्व है। मैंने लाखों राम भक्तों की जान बचाई है।

इतिहासकार भी यही लिखेंगे कि राम मंदिर के निर्माण की भूमिका छह दिसंबर 1992 को ही बन गई थी। उन्होंने बताया कि ढांचा न गिरता तो न्यायालय से मंदिर को जमीन देने का निर्णय भी शायद न होता। उसके अगले दिन तत्कालीन राज्यपाल उत्तर प्रदेश को मैने अपना इस्तीफा दे दिया और सरकार चली गई।

आजादी के बाद ही राम मंदिर के लिए फूंका जिन्होंने बिगुल…….

रामलला का मंदिर बनने जा रहा है अगर इस शुभ अवसर पर महंत राम चंद्र दास परमहंस का नाम न लिया जाए ऐसा कैसे हो सकता है। 1949 में राम जन्मभूमि पर रामलला के प्राकट्य प्रसंग का वर्णन होने पर वह एक नायक के रूप में सामने आए थे। उन्होंने पांच दिसंबर 1950 को वाद दायर कर राम लला के पूजन एवं दर्शन का अधिकार मांगा था।

1984 में जब विश्व हिंदू परिषद ने मंदिर के लिए जन आंदोलन शुरू किया तब भी वह आंदोलन की पहली पसंद बने और मंदिर आंदोलन का चेहरा बनकर सामने आए। नई दिल्ली की जिस धर्म संसद में राम जन्म भूमि मुक्ति यज्ञ समिति का गठन कर संघर्ष का प्रस्ताव पारित किया गया। उसकी अध्यक्षता भी परम हंस ने की थी।

फरवरी 1986 में उन्होंने रामलला का ताला न खोले जाने पर आत्मदाह तक करने का ऐलान कर दिया था। उनका कद उस वक्त  व्यापक हो गया जब उन्हें राम जन्म भूमि न्यास का अध्यक्ष चुनकर एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी गई।

मार्च 2002 में शिला दान के समय मंदिर निर्माण के लिए भी परमहंस ने आत्महत्या की घोषणा की थी। उनकी इसी घोषणा के चलते केंद्र सरकार के तत्कालीन दूत को मंदिर निर्माण के लिए शिला स्वीकार करनी पड़ी थी। राम मंदिर का सपना आंखों में सजाए रामचंद्र दास परमहंस ने 31 जुलाई 2003 को अंतिम सांस ली।

कारसेवकों का ऐसा जोश औऱ जज्बा जैसे लंका पर चढ़ाई करने जा रही हो राम की सेना………….

उस समय कारसेवक आंदोलन में शामिल हुए लोगों का कहना है कि कारसेवकों में  राम के नाम का ऐसा जोश और जज्बा था कि मानो वह राम के लिए लंका पर चढ़ाई करे जा रहे हों। पूरे प्रदेश और देश में कर्फ्यू लगा था। छह दिसंबर से 15 दिन पहले ही हर जनपद की सीमांए सीज कर दी गई थीं। किसी गांव औऱ जिले से कोई निकलकर न जा पाए इस लिए चप्पे चप्पे पर पुलिस और अर्धसैनिक बल का पहरा हो गया था। पर राम मंदिर के सूत्रधार आरएसएस के अशोक सिंघल ने सभी भक्तों से छह दिसंबर को अयोध्या पहुंचने का आवाह्न किया था। इतने कड़े पहरे  के बावजूद देश के कोने-कोने से लाखो की संख्या में राम भक्त जयकारे लगाते हुए अय़ोध्या पहुंच गए।

पुलिस-प्रशासन और अर्धसैनिक बल को उन्हें रोकने में पसीने आ गए। राम भक्त मर मिटने को अमादा थे। वह तय की गई तारीख और समय पर आयोध्या पहुंच गए। जिसके बाद ढांचा गिरा दिया गया और रामलला को अस्थाई टेंट में विराजमान किया गया।

इस लंबी लड़ाई के बाद भगवान राम के मंदिर बन जाने की प्रतिक्षा करते करते 17 नवंबर 2015 को अशोक सिंघल चिर निद्रा में लीन हो गए। इसमें कोई संदेह नहीं कि पांच अगस्त को रखी जा रही रामलाल मंदिर की नीव से उनकी आत्मा को अवश्य ही शांति मिलेगी।

ट्विटर पर वीडियो के साथ ताजा हो रहा राम मंदिर का आंदोलन …..

ट्विटर पर राम भक्त रत्नाकर ने हाल ही में 1990 का एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा है,  “1990 में हजारों कारसेवकों ने अपना बलिदान दिया था। अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर  मंदिर निर्माण के लिए यह वीडियो उस आंदोलन की बानगी भर है, दृश्य तो बहुत भयानक था। मुलायम सिंह यादव की क्रूरता की पहचान सोंचा आपको याद दिला दूं।” इस विडियो को देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि 6 दिसम्बर 1992 का आंदोलन कितना विकराल होगा.

 

 

 

 

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